MP में जेंडर सर्जरी ट्रेंड बढ़ा, एम्स भोपाल में मुफ्त सुविधा

Wed 29-Apr-2026,05:59 PM IST +05:30

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MP में जेंडर सर्जरी ट्रेंड बढ़ा, एम्स भोपाल में मुफ्त सुविधा MP-Gender-Reassignment-Surgery-Aiims-Bhopal
  • मध्यप्रदेश में युवाओं के बीच जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी का ट्रेंड बढ़ा, AIIMS भोपाल में एक साल में 5 सफल सर्जरी की गईं।

  • एम्स में मुफ्त सर्जरी सुविधा उपलब्ध, जबकि निजी अस्पतालों में 8 से 10 लाख रुपये तक खर्च, आम लोगों को बड़ी राहत।

  • सर्जरी से पहले काउंसलिंग और हार्मोनल थेरेपी जरूरी, विशेषज्ञों ने बिना विशेषज्ञ निगरानी के सर्जरी को खतरनाक बताया।

Madhya Pradesh / Bhopal :

Bhopal/ मध्यप्रदेश में 22 से 28 वर्ष के युवाओं के बीच जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। विशेष रूप से AIIMS Bhopal में पिछले एक साल के दौरान 5 सफल सर्जरियां की गई हैं, जहां पुरुषों ने सर्जरी के माध्यम से महिला बनने का विकल्प चुना।

एम्स भोपाल में यह सुविधा पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों में यही प्रक्रिया 8 से 10 लाख रुपये तक खर्चीली होती है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए यह बड़ी राहत साबित हो रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया में “बॉटम सर्जरी” शामिल होती है, जो अत्यंत जटिल होती है। इसमें पुरुष जननांग को हटाकर महिला जननांग का निर्माण किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के माध्यम से इस क्षेत्र में लगातार सुधार हो रहा है।

हालांकि डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सर्जरी बिना विशेषज्ञ निगरानी के कराना खतरनाक हो सकता है। गलत तरीके से की गई सर्जरी शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के गंभीर दुष्परिणाम पैदा कर सकती है।

एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी मरीज को सीधे सर्जरी के लिए नहीं भेजा जाता। इसके पहले लंबी काउंसलिंग प्रक्रिया और हार्मोनल थेरेपी की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यक्ति मानसिक रूप से इस परिवर्तन के लिए तैयार है।

इस बढ़ते ट्रेंड के पीछे सामाजिक कारण भी सामने आ रहे हैं। रीवा के एक युवक ने बताया कि उसे अपने दोस्तों से लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उसने अपनी पहचान बदलने का फैसला किया।

विशेषज्ञ मानते हैं कि समाज में जागरूकता की कमी और भेदभाव के कारण कई युवा इस दिशा में कदम उठा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि उन्हें सही मार्गदर्शन, मानसिक समर्थन और सुरक्षित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। यह ट्रेंड न सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र में बदलाव का संकेत है, बल्कि समाज में लैंगिक पहचान को लेकर बदलती सोच को भी दर्शाता है।